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    ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ मां सीताजी के प्राकट्य-क्षेत्र सीतामढ़ी (बिहार) को तीर्थ-क्षेत्र के रूप में विकसित करने तथा सीतामढ़ी में ही माता सीताजी के भव्य मंदिर-निर्माण के लिए वर्ष 2020 से ही प्रयत्न कर रही है। काउंसिल ने पिछले पांच वर्षों के दौरान सीतामढ़ी में, पटना में, दिल्ली समेत कई राज्यों में इस दिशा में कई बार जन-जागरूकता अभियान तथा जन-संपर्क अभियान चलाया, संगोष्ठी का आयोजन किया, साहित्य बंटवाया, प्रेस-वार्ता का आयोजन किया... प्रसन्नता का विषय है, हमारे देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने गुजरात के गांधीनगर में 10 मार्च 2025 को एक कार्यक्रम के दौरान मां सीताजी के प्रकट-स्थल ‘पुनौरा धाम’ में भी मां सीताजी का एक भव्य मंदिर निर्माण की घोषणा की तथा 08 अगस्त 2025 को पुनौरा धाम में मां सीताजी के भव्य मंदिर निर्माण हेतु आधारशिला भी रख दी।

    वहीं, काउंसिल के प्रयत्नों को देखते हुए बिहार सरकार अंतर्गत बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद ने 19 मई 2025 को काउंसिल को लगभग 12 एकड़ भूमि आवंटित कर दी तथा 23 मई 2025 को भूमि के निबंधन की प्रक्रिया भी पूरी हो गई। यह स्थान मां सीताजी के प्राकट्य-स्थान पुनौरा धाम से चार किलोमीटर दूर है। यह भूमि सीतामढ़ी में 833 वर्ष पुराने राघोपुर बखरी स्थित श्रीराम-जानकी स्थान की है, जो आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और एक पौराणिक मठ है और मठ के सामने एक खाली ज़मीन है, जिस पर नए मंदिर का निर्माण किया जाना है। काउंसिल परिवार का चिंतन है कि यहां 51 शक्तिपीठों से मिट्टी एवं ज्योत लाकर इस स्थान को एक शक्ति-स्थल के रूप में विकसित करना है।

    राघोपुर बखरी स्थित श्रीराम-जानकी स्थान पर ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ का संकल्प-

    ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ जीर्ण-शीर्ण अवस्था वाले इस पौराणिक मठ को पुनः जीर्णोद्धार कर श्रीराम-जानकी का एक भव्य मंदिर स्थापित करना है, तो वहीं मठ के सामने खाली भूमि पर 51 शक्तिपीठों से मिट्टी एवं ज्योत लाकर इस स्थान को एक शक्ति-स्थल के रूप में विकसित करना है। प्रतिमा के चारों ओर वृताकार रूप से 108 ऐसी प्रतिमाओं का निर्माण होना है जिनसे माता सीताजी के जीवन-दर्शन का उल्लेख हो सके। वृताकार इन 108 प्रतिमाओं का दर्शन नौका-विहार रूप से किया जाना है। नौका विहार हेतु नौका दोनों दिशा- ‘आगमन तथा प्रस्थान’ कर सके, ऐसी रूपरेखा विकसित होगी।

    सीतामढ़ी में मां सीताजी को शक्ति-स्वरूप में विराजमान करने के लिए श्रीराम-जानकी स्थान ही क्यों ?

    सीतामढ़ी स्थित पुनौरा धाम मंदिर से चार किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम में एक गांव राघोपुर बखरी है। तकरीबन 3,000 लोगों की जनसंख्या वाले इस छोटे से गांव की पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्ता को बहुत कम लोग जानते हैं। वैसे तो सीतामढ़ी में माता सीताजी के प्राकट्य को लेकर दो भिन्न मान्यताएं हैं। एक स्थान है- पुनौरा धाम तथा दूसरा- जानकी स्थान। दोनों पर भिन्न-भिन्न रूप से लोगों की आस्था व विश्वास है, लेकिन अगर सीतामढ़ी में सबसे प्राचीन मंदिर के विषय में पूछा जाए तो राघोपुर बखरी स्थित श्रीराम-जानकी स्थान का ही नाम आता है। जीर्ण-शीर्ण अवस्थापूर्ण इस मंदिर में आज भी भगवान के गर्भ-गृह वाले दीवार पर सन् 1193 में निर्मित होने की जानकारी प्राप्त होती है। अर्थात् आज से लगभग 833 वर्ष पुराना स्थान है यह।

    इस श्रीरामजानकी मठ को लोग स्थानीय जनकपुरधाम के नाम से जानते हैं। इसकी निर्माण शैली, वास्तु और सजावट नेपाल के प्रसिद्ध जनकपुर धाम से मेल खाती है।

    इस स्थान के महंत श्रीरामलीला दास जी बताते हैं कि उनके दादा गुरु बताते थे कि जब इस मंदिर का निर्माण हुआ था तो मंदिर की चारदीवारी तकरीबन 20 फीट ऊंची थी और मंदिर का भाग तकरीबन एक बीघे में फैला था। वे बताते हैं कि यहां नौ पीढ़ी से उनके पूर्वज महंत इस स्थान का देख-रेख कर रहे हैं। आज भी इस मंदिर में पूर्वी भारत के तकरीबन 2000 से 3000 वर्ष पुराने 'टेराकोटा ब्रिक बंगाली आर्किटेक्चर' की झलक देखी जा सकती है जो मुगलकालीन सभी बंगाली मंदिरों में सामान्य है।

    मंदिर का मुख्य आकर्षण गर्भगृह के प्रवेश के बायीं ओर लगा विशाल घंटा है, जिसकी शोभा अतुलनीय है। घंटे का वजन तकरीबन 400 किलोग्राम है। इसकी धातु दमामी मठ, नौलखा मंदिर, जनकपुर से मिलती जुलती है। इस घंटा में जंग का कोई निशान नहीं है। इसकी संरचना सम्मोहित करती है। घंटे के नीचे चरण-पादुका स्थित है जिसपर 'श्री चतुर भुजाय नमः' अंकित है। श्रीराम-जानकी स्थान के पास रहने वाले एक ग्रामीण श्री भोला ठाकुर बताते हैं कि एक समय सुबह-सुबह इस घंटे की आवाज़ पास के 10 गांव तक जाती थी। घंटे की टनकार सुनकर ही लोगों की नींद खुलती थी।

    श्रीराम-जानकी स्थान पर बने मंदिर में आज भी गर्भ-गृह की रक्षा करते हैं

    श्रीजटायु भगवान और श्रीहनुमानजी

    महंत श्रीरामलीला दास बताते हैं कि इस स्थान पर दर्जनों बार भूकंप आया। बहुत नुकसान हुआ। पांच बार तो ऐसी क्षति पहुंची कि पूरा मंदिर परिसर ही ढह गया। मंदिर परिसर के लगभग हर दीवार में दरारें आ गईं, मगर आश्चर्य का विषय है कि श्रीराम-जानकी स्थान के गर्भ-गृह की दीवार आज भी वैसे ही है। महंत श्रीरामलीला दास बताते हैं कि उनके गुरु ब्रह्मलीन रामकृष्ण दास जी कहते थे कि यहां के गर्भ-गृह में श्रीराम-जानकी जी की रक्षा गरुड़ स्वरूप में श्रीजटायु भगवान और श्रीहनुमानजी सदैव करते रहेंगे। गर्भ-गृह की दीवार पर बाईं ओर गरुड़ स्वरूप में जटायु भगवान सावधान की मुद्रा में विराजमान हैं तो वहीं दाईं ओर श्रीहनुमानजी हैं।

    महंत श्रीरामलीला दास जी बताते हैं कि गरुड़ जी ने सबसे पहले श्रीजटायू रूप में माता सीताजी की रक्षा की थी। रावण के साथ हवाई युद्ध किया। जटायु के प्रयास सफल नहीं हुए और वह बुरी तरह घायल हो गए। श्रीजटायु जी ने ही प्रभु श्रीरामजी को मां सीताजी के अपहरण के बारे में बताया। श्रीजटायु जी की वीरता श्रीरामजी के लिए प्रेरणा बनी और उन्होंने मां सीताजी को खोजने के लिए वानर सेना का साथ लेकर युद्ध किया था। वहीं, श्रीसीतारामभक्त पवनसुत हनुमानजी की भक्ति के क्या ही कहने।

    मान्यताः

    कहते हैं कि पुराने समय में जब भी इस क्षेत्र के लोगों के प्राण संकट में होते थे या आर्थिक तंगी से जूझ रहे होते थे तो इस मंदिर में वो विशेष अनुष्ठान करने आते थे। दूर-दूर से लोग यहां आते थे। आज भी कुछ अनुभवी लोग इस विषय को जानते हैं। इसी मान्यता से अभिभूत होकर यहां कई वर्षों तक 24 घंटे संकीर्तन भी चलता रहा था।

    ऋषि विश्वामित्र जी यहां श्रीरामजी और लक्ष्मणजी के साथ ध्यान करते थे-

    महंत श्रीरामलीला दास जी एवं ग्रामीण श्री भोला ठाकुर बताते हैं कि उन्हें इस मठ के पूर्व महंत बताते थे कि उनके पूर्वज गुरु कहा करते थे कि ऋषि विश्वामित्र जी कई बार इस स्थान पर आए। ऋषि के साथ प्रभु श्रीरामजी और लक्ष्मण जी के साथ होने का उल्लेख उनके पास था। यहां ऋषि विश्वामित्र घंटों विहार कर ध्यान करते थे और इसे ध्यान-योग्य मनोरम-स्थल बताते थे।

    ऋषि की इसी ध्यान-परंपरा के लिए सीतामढ़ी का यह सबसे बड़ा ध्यान-केंद्र माना जाता है। भले ही प्राकट्य स्थल के लिए कई मान्यताएं हों, लेकिन यह 833 वर्ष पुराने सीतामढ़ी के सबसे प्राचीन मठ के रूप में आज हम सबके सामने है। यह स्थल संतों की ऐसी तपोस्थली हुई कि श्रीराम-जानकी मंदिर स्थान के ठीक सामने दो सिद्ध-साधक-संतों की आज भी समाधि-स्थल देखी जा सकती है। कहते हैं कि इन संतों ने तपस्या करते-करते सशरीर ही समाधि ले ली। बहुत से लोग इसे ऋषि विश्वामित्र की कृपा का साक्षात परिणाम मानते हैं।

    ऐतिहासिक विरासत

    श्रीरामजानकी मठ की ऐतिहासिक विरासत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पूर्व में यह इलाका जंगल से घिरा था। विश्वामित्र ऋषि जी की ध्यान-परंपरा का निर्वहन करते हुए यहां के लोकप्रिय सिद्ध संत श्रीरघुनाथ महाराजजी कुटिया बनाकर तप करते थे। उनके ज्ञान व तप की चर्चा विश्वभर में थी। वो जब इस स्थान पर ध्यान लगाते थे तो उनके कई दिनों तक समाधि-मुद्रा में ही लीन रहते थे।

    उन दिनों दरभंगा महाराज के ख्याति की चर्चा बहुत प्रचलित थी। एक बार दरभंगा महाराज संत श्रीरघुनाथ महाराजजी के दर्शन हेतु इस श्रीराम-जानकी स्थान पर हाथी से आ रहे थे। एक तपस्वी साधक के सामने हाथी से आ रहे दरभंगा महाराज के इस विचार से सिद्ध संत रघुनाथ महाराजजी नाराज़ हुए और वह जिस चबूतरे पर बैठे थे, अपनी साधना-तप से ऐसा प्रताप दिखाया कि वह चबूतरा ही उन्हें बिठाए हुए लेकर चल पड़ा और जाकर दरभंगा महाराज के सामने रुका। यह देख दरभंगा महाराज घोर आश्चर्य में पड़ गए। वो हाथी से उतरे और संत के सामने शाष्टांग दण्डवत हो गए, अपनी गलती स्वाकारी। दरभंगा महाराज की ओर से उन्होंने संत श्रीरघुनाथ महाराजजी को इस स्थान के विस्तार हेतु 250 एकड़ भूमि दान में दी, ताकि धार्मिक गतिविधियों और मंदिर की सेवा के लिए यहां आर्थिक संसाधन बने रहें। लंबे समय तक यह मठ धार्मिक आयोजनों का केंद्र रहा, लेकिन कालांतर में संरक्षण की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण इसकी संपत्ति पर अतिक्रमण होता गया।

    बाद में चलकर संत रघुनाथ महाराज ने भी तपस्थल पर ही जीवित समाधि ले ली थी। तीन दशक पूर्व तक इस स्थान पर श्रीरामनवमी, झूलन व दशहरा के अवसर पर विभिन्न धार्मिक उत्सव धूमधाम के साथ आयोजित किए जाते थे। विशाल जुलूस, आतिशबाजी, ढोल नगाड़े के साथ घुड़दौड़ देखने इलाके के लोग बहुत दूर-दूर से आते थे। बाज़ार में अखाड़ा होता था, जिसमें बाहर से पहलवान भी शामिल होते थे। मठ में संत व राहगीरों को आश्रय मिलता था। वर्तमान महंत रामलीला दासजी बताते हैं कि 1983 से वे मठ का कार्य संभाल रहे हैं।

    वर्तमान स्थिति

    सीतामढ़ी में डुमरा प्रखंड के बेरबास पंचायत के राघोपुर बखरी गांव में स्थापित ऐतिहासिक श्रीरामजानकी मठ का विशाल भवन आज खंडहर बन चुका है। खंडहर हो रहे मठ के भवन की भव्यता, इस पर उकेरे गए शिल्प व स्थापत्य इसके ऐतिहासिक व कलात्मक महत्व को रेखांकित करते हैं। मठ प्रांगण चारों ओर से विशाल दो-मंजिले भवन से घिरा है। प्रांगण के भीतर ही आकर्षक श्रीरामजानकी मंदिर है, जिसके दरवाजे पर खुदे लेख में मठ के संवत 1193 में महंत रघुनाथ दास महाराज द्वारा स्थापित होना अंकित है। मुख्य द्वार से अंदर जाने के बाद श्रीरामजानकी मंदिर जाने के लिए एक और द्वार है। मंदिर द्वार प्रवेश करते ही बाईं ओर एक आयताकार अहाता है जिसमें सांस्कृतिक संध्या आयोजित होते थे। वहीं एक ओर संतों की बैठक का खुला स्थान था तथा दाईं ओर कुछ कमरे बने थे जिसमें संत निवास करते थे। मंदिर व अन्य भवनों की भव्यता, पुरानी शैली के झरोखे, पत्थर के खंभे व बरामदे, इस पर उकेरे गए शिल्प तत्कालीन स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है। पत्थर से बने स्तंभ में टंगा साढ़े बारह मन वजनी घंटा भी आकर्षक है। लेकिन पीड़ादायक रहा कि देखरेख की कमी और वर्षों की उपेक्षा के कारण ये सारा कुछ खंडहर बनकर दिन-प्रतिदिन धाराशायी होता गया। श्रीरामजानकी मठ का भव्य गुंबद और नक्काशीदार दीवारें अब जर्जर हो चुकी है। जहां कभी श्रद्धालु राम-जानकी की भक्ति में लीन रहते थे, आज वहां सन्नाटा पसरा रहता है। छत ढह चुकी हैं, दीवारों में दरारें आ गई हैं और परिसर में जंगली घास उग आई हैं।

    आज की स्थिति यह है कि मंदिर की अधिकांश जमीन बहुत पहले ही बिक चुकी हैं, या लोगों ने कब्जा कर लिया है, ऐसे में बची हुई शेष भूमि जो ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ को बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद से आवंटित हुई है, उससे यह स्थल सिर्फ धार्मिक महत्व का ही नहीं, बल्कि पर्यटन, शोध और सांस्कृतिक धरोहर का भी केंद्र बन सके, इस निमित्त क्षेत्रवासियों की आशा पुनः जग चुकी है।

    श्रीराम-जानकी स्थान को विकसित करने की योजना-

  • मंदिर का मूल श्रीराम-जानकी स्थान जो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, उसका जीर्णोद्धार कर श्रीराम-जानकीजी का भव्य मंदिर निर्मित किया जाना है।
  • श्रीराम-जानकी स्थान के सामने 12 एकड़ के भूमि परिसर में 51 शक्तिपीठों से मिट्टी एवं ज्योत लाकर एक शक्ति-स्थल के रूप में मंदिर निर्मित किया जाएगा।
  • इस पूज्यनीय दिव्य गर्भ-गृह के चारों ओर वृताकार रूप से श्रीभगवती सीताजी की 108 ऐसी प्रतिमाएं होंगी जो उनके जीवन-दर्शन को (प्रारंभिक से क्रमवार) बिना किसी शब्द के ही वर्णित कर देगा।
  • जगतजननी मां जानकी जी के जीवन-दर्शन को प्रदर्शित करते 108 प्रतिमाओं का दर्शन नौका-विहार रूप से विकसित किया जाएगा। नौका विहार हेतु- नौका दोनों दिशा- आगमन तथा प्रस्थान कर सके, ऐसी रूपरेखा विकसित होगी।
  • मंदिर की बनावट: संरचना श्रीविद्या के अनुरूप विकसित किया जाना है।
  • इस पवित्र परिसर में सभी देवी-देवता अपने अद्भुत रूप में स्थापित होंगे। जैसे बालाजी, बांके बिहारी जी, खाटू-श्यामजी आदि कई देवतागण उसी स्वरूप में स्थापित होंगी, जो वे अपने स्वरूप में संबंधित स्थल पर स्थापित हैं। वहीं श्रीतुलसीदासजी, श्रीवाल्मिकीजी, श्रीकेवटजी समेत कई महापुरुषों की पूज्यनीय प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएंगी ।

  • आर्किटेक्ट-

    अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण में लगे आर्किटेक्ट श्री आशीष सोमपुरा जी इस मंदिर का डिजाइन तैयार कर रहे हैं। प्रथम चरण में उन्होंने मंदिर का एक डिजाइन भी काउंसिल के समक्ष प्रस्तुत किया है। अंतिम स्वरूप का निष्कर्ष तय होने के बाद उसे जनमानस हेतु सार्वजनिक किया जाएगा। पटना आईआईटी का भी धन्यवाद जिन्होंने इस कार्य में हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया है।

    अपडेट्सः-

  • 19 मई 2025 को बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद ने काउंसिल को लगभग 12 एकड़ भूमि आवंटित की।
  • 23 मई 2025 को सीतामढ़ी स्थित निबंधन कार्यालय में भूमि-निबंधन की प्रक्रिया पूर्ण हुई।
  • 10 जून 2025 को नई दिल्ली में संतों ने अपने श्रीमुख से सीतामढ़ी में बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद द्वारा भूमि आवंटित किए जाने की घोषणा की तथा भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प लिया।
  • केवल मंदिर बनाना उद्देश्य नहीं, विश्व की नारी-आदर्श का एक ‘सांस्कृतिक केंद्र’ बनाने का संकल्पः

    ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ का उद्देश्य सीतामढ़ी में केवल मंदिर बनाना ही नहीं है, बल्कि नारी-शक्ति का एक ऐसा केंद्र स्थापित करना है, जो विश्व की नारी-शक्ति का एक केंद्र बने। इस विषय की नितांत आवश्यकता इसलिए है क्योंकि आज विश्व में एक भी ऐसा स्थान नहीं है जहां नारी-शक्ति के सामर्थ्य पर शोध हो रहा हो। यह सीतामढ़ी में इसलिए विशेष होगा, क्योंकि एक तरफ हमारे आराध्य प्रभु श्रीरामजी के जन्मस्थान पर अयोध्या में भव्य मंदिर को हम ‘राष्ट्र-मंदिर’ मानते हैं तो वहीं सीतामढ़ी में जगतजननी मां जानकीजी का जन्म तो नहीं भूमि से उद्भव हुआ अर्थात प्राकट्य हुआ, ऐसे में सीतामढ़ी के पूरे प्राकट्य क्षेत्र को ही हम नारी-आदर्श के एक ‘सांस्कृतिक केंद्र’ के रूप में विकसित करना चाहते हैं।

    सीतामढ़ी को तीर्थ-क्षेत्र के रूप में विकसित करने का संकल्पः-

    धन्य है सीतामढ़ी की धरा जहां मां सीताजी ने अवतार लिया। काउंसिल ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर संघर्ष पर आधारित अपने ग्रंथ (1250 पृष्ठों का) ‘श्रीरामलला- मन से मंदिर तक’ में एक आलेख में पूरी सीतामढ़ी की धरती को ही ऊर्जा का पुंज बताया, जहां से जगतजननी श्रीभगवती जानकी जी प्रकट हुई हैं। उस आलेख में वर्णित है कि क्यों मिथिला की धरा इतनी प्रखर है और ऊर्जावान है, क्योंकि उस धरा से राज-राजेश्वरी पराशक्ति मां जगदम्बा ने स्वयं अवतार लिया है। अतः काउंसिल पूरे सीतामढ़ी क्षेत्र को ही तीर्थ-क्षेत्र के रूप में विकसित करना चाहती है।

    हर नारी में ‘सीता तत्त्व’ / ‘भगवती-तत्त्व’ भाव-बोध को उद्धृत करने हेतु काउंसिल का प्रयासः

    माता सीताजी भूमिजा हैं, भूमि से प्रकट हुईं तथा एक साधारण नारी-स्वरूप में पृथ्वी पर आकर नारी-आदर्श के एक प्रेरणा-स्वरूप को स्थापित किया है और फिर नारी-शरीर में समस्त लीला कर भूमि की पुत्री ‘भूमि’ में ही समा जाती हैं।

    त्रेतायुग में जनकपुर में जगतजननी मां जानकी जी के स्वयंवर में जिस पिनाक धनुष को उठाने के लिए अच्छे-अच्छे राजाओं के पसीने छूट जाते हैं, उसे मां सीताजी अपने महल में गृह-कार्य हेतु एक तुच्छ वस्तु की भांति प्रतिदिन इधर से उठाकर उधर करती रहीं थीं। जब इस विषय की जानकारी राजा जनक जी को हुई तो उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वह समझ गए कि उनकी पुत्री जानकी जी कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि साक्षात अवतार है। क्योंकि वह धनुष कोई साधारण धनुष नहीं था, बल्कि भगवान शिव का बहुत ही शक्तिशाली और चमत्कारिक धनुष था। इस धनुष को उठाना साधारण पराक्रम नहीं था। इसलिए ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ के लिए यह शोध का विषय है कि आखिर वो कौन सी शक्ति है जो जानकी जी के पास थी।

    ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ ने एक पुस्तक ‘श्रीभगवती सीता- महाशक्ति साधना’ का प्रकाशन किया है। इस पुस्तक में कई संतों ने यह विचार रखा है कि दुर्गा सप्तशती में मार्कण्डेय ऋषि जी जिस सौम्य स्वरूप की चर्चा करते हैं, वह मां सीताजी का ही स्वरूप है। पुस्तक में मां सीताजी की आराधना के साथ कई विषयों को तथ्यपूर्ण तरीक से प्रस्तुत किया गया है जो प्रमाणित करता है कि मां सीताजी साक्षात भगवती की अवतार हैं।

    मार्कण्डेय ऋषि जी दुर्गा सप्तशती में लिखते हैं-

    विद्याः समस्ताः तव देवि भेदा:। स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु॥

    अर्थात- सभी विद्याएं देवी के ही विभिन्न स्वरूपों की अभिव्यक्ति है और जगत की समस्त नारीशक्ति में उन जगदम्बा महाशक्ति श्रीभगवती का ही प्रतिरूप है।

    अर्थात- हर नारी में ‘सीता-तत्त्व’ अर्थात ‘भगवती-तत्त्व’ है। उसी तत्त्व के कारण कोई भी नारी साधारण नहीं है और यही उनमें तत्त्व, हर एक नारी को एक विशिष्ट शक्ति भी प्रदान करता है जिससे वह एक अच्छी पुत्री, बहन, मां, गृहिणी समेत कई स्वरूपों में अपनी भूमिका निभाते हुए एक साथ कई कार्यों को करने में दक्ष होती हैं। यह बहुत छोटा विषय है। शक्ति के उपासक कई संत कहते हैं कि एक नारी अगर शक्ति का आह्वान करे तो जितना एक पुरुष दस वर्ष में शक्ति की उपासना कर प्राप्त नहीं कर सकता, उतना एक नारी-शक्ति दस महीने में शक्ति को आह्वान कर द्रवित कर सकती है।

    लेकिन वह ‘सीता-तत्त्व’ अर्थात ‘भगवती-तत्त्व’ हर एक नारी में क्या है, यह शोध का विषय है। इसलिए ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ ‘जानकी शोध केंद्र’ की स्थापना करना चाहती है। इस निमित्त अध्ययन केंद्र, पुस्तकालय और डिजिटल संग्रहालय का निर्माण भी प्रस्तावित है।

    काउंसिल अंतर्गत पुस्तक ‘श्रीभगवती सीता- महाशक्ति साधना’ को विभिन्न भाषाओं में कई देशों में अनुवाद कर तथा मां जानकी जी के शोध-साहित्य के माध्यम से जीवन-आदर्श के प्रसार का संकल्पः-

    रामायण रिसर्च काउंसिल’ यह मानती है कि मां सीताजी के जीवन-आदर्शों को हम जितना प्रसारित करेंगे, उतना ही हम नारी सशक्तिकण को बल दे पाएंगे। नारी को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनमें जो ‘सीता-तत्त्व’ अर्थात ‘भगवती-तत्त्व’ का समावेश है, उसका बोध कराना बहुत आवश्यक है।

    ऐसा नहीं है कि भारत की जो माता है, उन्हीं में ‘सीता-तत्त्व’ अर्थात ‘भगवती-तत्त्व’ है और उदाहरणस्वरूप कोई फ्रांस या अन्य देशों में माता है, तो उनमें यह तत्त्व नहीं है। काउंसिल से जुड़े संतों का चिंतन है कि दुनिया की हर माता में ‘भगवती-तत्त्व’ है, बस आवश्यकता है उसे जगाने की। माताओं के उन्हीं तत्त्व का उन्हें बोध कराने के लिए हम काउंसिल के तत्त्वावधान ‘श्रीभगवती सीता- महाशक्ति साधना’ को हम दूसरे संस्करण में और वृहद कर रहे हैं। कई भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं। इस पुस्तक पर जब हम चर्चा करेंगे, विश्व की नारी-समाज को त्रेतायुग के विषय में बताएंगे कि कैसे उस काल में भारत में एक जगह है एक साधारण नारी ने जन्म नहीं बल्कि भूमि से प्राकट्य लिया था और उन्होंने पूरे नारी समाज के जीवन-आदर्शों को प्रेरणा दिया, जिस पर हर नारी को विचार करना चाहिए और साथ ही यह भी बताएंगे कि उन नारी ने यह भी संदेश दिया था कि हर नारी के भीतर एक अदम्य एवं अलौकिक शक्ति छिपी है, जिसे एक ऋषि मार्कण्डेय जी ने उन ‘शक्ति’ एवं उनके विभिन्न स्वरूपों का वर्णन किया। इन विषयों को जब हम दुनियाभर की मातृ-शक्तियों को उनकी भाषा में समझाएंगे और उन्हें उन्हीं की भाषा में उन शक्ति-स्वरूपा ‘श्रीभगवती’ के आह्वान का गूढ़ रहस्य समझाएंगे और हमारे शोध-संस्थानों से जो अमृत-रूपी विषय उभरेगा, उसका भी संदर्भ देंगे। निस्संदेह पराम्बा श्रीभगवती कृपा उन पर भी होगी और मां सीताजी के जीवन-दर्शन का प्रसार होगा।